यदि बारिश न हो तो इस गांव में होता है ‘भीकुली बिया’, फिर होती है बारिश

यदि बारिश न हो तो इस गांव में होता है ‘भीकुली बिया’, फिर होती है बारिश

भारत पूरे विश्व में अपनी पौराणिक परंपराओं और मान्यताओं के कारण प्रसिद्ध है। यहां जगह के साथ जाति-धर्म ही नहीं बल्कि हर चीज में बदलाव दिखता है। चाहे फिर वो मुख्य त्यौहार जैसे होली, दीवाली या ईद हो या फिर गणगौर और छठ जैसे अलग-अलग राज्यों के त्यौहार हों। इसी प्रकार यहां हर शहर और गांव की कुछ भिन्न मान्यताएं हैं जो कि सुनने में तो काफी विचित्र लगती हैं पर लोगों की इनमें बड़ी श्रद्धा है। ऐसी ही एक परंपरा ‘असम के रंगडोई गांव’ में है जहां ‘मेंढक और मेंढकी की शादी’ करवाई जाती है।

थोड़ा अजीब तो लगता है पर असम के जोरहट जिले के रंगडोई गांव की यह परंपरा यहां के ग्रामीणों में काफी आम है। असम के लोगों में मान्यता है कि ‘भीकुली बिया’ यानी मेंढक और मेंढकी के विवाह से बारिश का गांव में आगमन होता है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा में सिर्फ मेंढकों का होना ही खास नहीं है। मगर इससे खास है मेंढक और मेंढकी के बीच होने वाला विवाह जो कि इंसानों के विवाह के रूप में पूरी रस्मों के साथ किया जाता है।

ऐसे होता है विवाह :

विवाह के लिए मेंढक और मेंढकी को दुल्हा और दुल्हन की तरह सजाया जाता है। दोनों को अलग-अलग घरों में रखा जाता है और दोनों को साफ करके शादी के लिए तैयार किया जाता है। यह विवाह दुल्हन के घर पर असम के पारंपरिक विवाद के रूप में किया जाता है जिसमें अग्नि के सामने पंडित सभी मंत्रों को पढ़ रस्मों को पूरा करता है। किसी आम विवाह की तरह इस शादी में भी गांव के सभी लोग शिरकत करते है, पारंपरिक गीत गाते हैं और विवाह का मजा उठाते हैं। विवाह के पूरे होने पर मेंढकों को वापस पानी में छोड़ दिया जाता है।

इसके पीछे ये है मान्यता :

इस विवाह के पीछे का कारण है बारिश के भगवान इंद्रदेव को प्रसन्न करना। दरअसल गर्मियों के दिनों में जब तापमान बढ़ जाता है और बारिश न होने के कारण सूखा पड़ता है तब गांव में ‘भीकुली बिया’ करवाया जाता है। असम के लोग मानते हैं कि अगर मेंढकों को पकड़ कर उनका इंसानों की तरह सभी रस्मों के साथ विवाह करवाया जाता है तो इससे बारिश के देवता इंद्रदेव प्रसन्न होते है। यह भी माना जाता है कि विवाह के बाद मेंढकों का टरटराना इंद्रदेव को बारिश के लिए आग्रह करने का प्रतीक है क्योंकि इंद्रदेव तब तक बारिश नहीं करते जब तक मेंढक उनसे न कहें।

अब यह परंपरा सिर्फ इस गांव तक ही सीमित नहीं है। भारत के कई राज्य जैसे महाराष्ट्र, त्रिपुरा और उत्तर प्रदेश में भी लोगों की इसमें काफी श्रद्धा है।

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