राहु-केतु का ग्रहण से क्या है संबंध ! क्या आप जानना चाहते हैं?

राहु-केतु का ग्रहण से क्या है संबंध ! क्या आप जानना चाहते हैं?

ग्रहण का नाम आते ही आम लोगों के मन में कई तरह के डर और संदेह उभरने लगते हैं। वैसे देखा जाए तो सूर्यग्रहण का महत्व धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से बहुत ज्यादा माना जाता है। जो व्यक्ति के जीवन पर विशेष प्रभाव डालता है। जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से यह सिर्फ एक खगोलीय घटना है। गुरुवार 26 दिसंबर को सूर्यग्रहण लगने जा रहा है।

इसके वैज्ञानिक और पौराणिक तौर के महत्व को आप इस तरह समझें।
विज्ञान के अनुसार पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूमता है। पृथ्वी और चंद्रमा घूमते हुए एक समय पर ऐसे स्थान पर आ जाते हैं जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा तीनों एक सीध में रहते हैं। जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच में आ जाती है और वह सूर्य को ढ़क लेता है तो उसे सूर्य ग्रहण कहते हैं।

दूसरा पौराणिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय देवताओं और दानवों के बीच अमृत पान के लिए विवाद हुआ था। जिसे सुलझाने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया। मोहिनी के रूप से सभी देवता और दानव उन पर मोहित हो उठे तब भगवान विष्णु ने देवताओं और दानवों को अलग-अलग बिठा दिया।

तब एक असुर, छल से देवताओं की लाइन में आकर बैठ गया और अमृत पान करने लगा। तब चंद्रमा और सूर्य ने इस दानव को ऐसा करते हुए देख लिया। इस बात की जानकारी उन्होंने भगवान विष्णु को दी, जिसके बाद भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से दानव का सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन तब तक दानव ने अमृत मुंह में ले लिया था, जिसके कारण उसकी मृत्यु नहीं हुई और उसके सिर वाला भाग राहु और धड़ वाला भाग केतु के नाम से जाना गया।

इसी कारण से राहु-केतु सूर्य और चंद्रमा को शत्रु मानते हैं। इसलिए राहु केतु सूर्य और चंद्रमा का ग्रास कर लेते हैं। इस स्थिति को ग्रहण कहा जाता है। वहीं मान्यताओं के अनुसार ग्रहण के समय देव कष्ट में होते हैं क्योंकि राहु-केतु शक्तिशाली थे। इसलिए ग्रहण को देखने से विपरीत प्रभाव पड़ते हैं।

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