Hindi Diwas: राष्ट्रभाषा से लेकर हिंदी दिवस मनाने तक, वो सबकुछ जो आज आप जानना चाहते हैं

Hindi Diwas: राष्ट्रभाषा से लेकर हिंदी दिवस मनाने तक, वो सबकुछ जो आज आप जानना चाहते हैं

Hindi Day Special 2020: बहुत कम लोग जानते होंगे कि अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व सर्वधर्म सम्मेलन में हिंदी में भाषण देने वाले व्यौ​हार राजेंद्र सिंह Beohar Rajendra Singh के जन्मदिन को ही हम हिंदी दिवस के रूप में मनाते हैं। देश में हिंदी दिवस मनाने की शुरुआत आज से करीब 67 साल पहले हुई। इसके लिए 14 सितंबर के दिन को चुना गया। ये सब मुमकिन हुआ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा की अनुशंसा पर। मगर ये सब इतना आसान नहीं था। इसके लिए उस समय के हिंदी साहित्यकारों ने बहुत संघर्ष किया। तब कहीं जाकर आज हम इस दिन को हिंदी दिवस के रूप में मना पाते हैं। इसमें व्यौहार राजेंद्र सिंह, काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, हजारीप्रसाद द्विवेदी एवं सेठ गोविन्ददास की एक अहम भूमिका रही है।

इसलिए चुना 14 सितंबर :

वर्ष 1953 से लगातार 14 सितंबर के दिन देशभर में ‘हिंदी दिवस’ मनाया जाता है। मगर इस ​14 सितंबर के पीछे की खास वजह व्यौहार राजेंद्र सिंह हैं। हिंदी के इस मूर्धन्य साहित्यकार का जन्म मध्यप्रदेश के जबलपुर में हुआ। जिन्होंने हिंदी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिलाने के लिए कड़ी मेहनत की। उनके इस संघर्ष में कई बड़े-बड़े साहित्यकार एवं हिंदी भाषा के जानकार भी शामिल थे। 14 सितंबर 1900 को जन्में राजेंद्र सिंह ​के इस प्रस्ताव को 14 सिंतबर, 1949 के दिन संविधान सभा में पेश किया गया।

बता दें कि इस दिन राजेंद्र सिंह का 50वां जन्मदिन था। आखिर में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि हिंदी ही देश की राष्ट्रभाषा होगी। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा की अनुशंसा पर व्यौहार राजेंद्र सिंह के अथक प्रयासों को देखते हुए इसके ठीक चार साल बाद यानी 1953 में 14 सितंबर के दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाने के लिए मुहर लगा दी गई।

हिंदी के अलावा 7 भाषाओं पर मजबूत पकड़ :

राष्ट्रभाषा बनाने को लेकर ऐसा नहीं था कि राजेंद्र सिंह केवल हिंदी भाषा के ही अच्छे जानकार थे। बल्कि हिंदी से ज्यादा उन्हें संस्कृत, बांग्ला, मराठी, गुजराती, मलयालम, उर्दू और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान था। उसके बाद भी उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का बीड़ा उठाया। जब हिंदी को राष्ट्रभाषा की मान्यता मिली तो दिल्ली से इसकी खबर सबसे पहले सेठ गोविंददास Seth Govind Das ने दी। चूंकि वह उस समय जबलपुर से सांसद थे। सेठ गोविंददास ने राजेंद्र सिंह को उनके जन्मदिन के उपहार स्वरूप यह संदेश भेजा था, जिसे पढ़कर वह काफी खुश हुए।

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