जामिया मिलिया में हुई हिंसा का आंखों देखा पूरा सच पढ़ें, एक अलग अंदाज में बयां हकीकत..

जामिया मिलिया में हुई हिंसा का आंखों देखा पूरा सच पढ़ें, एक अलग अंदाज में बयां हकीकत..

दिल्ली/वैभव सिंह. जामिया मिलिया इस्लामिया में यह 13 दिसम्बर 2019 की शाम है. यहां भाजपा द्वारा लोकसभा में नागरिकता संशोधन बिल पास होने के बाद विरोध प्रदर्शन हो रहा है. देश के तीन बड़े केंद्रीय विश्वविद्यालय इस समय चर्चा में हैं. एएमयू, जेएनयू और जामिया. एमयू और जामिया मुस्लिम अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय हैं. जेएनयू को वामपंथ का गढ़ माना जाता है. वहीं रिसर्च और पढ़ाई के मामले में जेएनयू और जामिया देश के सर्वश्रेष्ठ केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से एक हैं. देश में भाजपा की सरकार बनने के बाद से ही स्पष्ट हो गया था कि इन विश्वविद्यालयों में भाजपा का चरम विरोध होगा. यह विरोध सिर्फ वैचारिक स्तर पर ही नहीं बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर भी होगा. और हुआ भी यही.

अब बात करते हैं 13 दिसम्बर 2019 की शाम जहां आंदोलन हो रहा है. पहले दिन से ही यह आंदोलन भटक गया. इसके कई कारण थे. पढ़ रहे छात्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमितशाह और योगी आदित्यनाथ को व्यक्तिगत रूप से टारगेट कर रहे थे. उन्हें गालियां दे रहे थे और उनके खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे. सामान्य छात्रों में वह छात्र थे जिनका आंदोलन से कोई मतलब नहीं था उन्हें ‘सीएए’ से कोई परेशानी नहीं थी, पर वह सीएए व एनआरसी को डिजास्टर मान रहे थे. इस वजह से वह सरकार का विरोध कर रहे थे. व्यक्तिगत रूप से उन्हें सरकार से कोई परेशानी नहीं थी. इसमें हिंदू व मुस्लिम सहित सभी समुदाय के छात्र थे.

स्वार्थी छात्रों में वह छात्र थे जो राजनीति में पूर्ण रूप से सक्रिय थे. वह इस मौके का फायदा उठाकर अपनी राजनीति चमकाना चाहते थे. इसमें मीड़िया के छात्र भी ज्यादा थे. जो इस आंदोलन के जरिए अपने आप को ब्रांड और अपने कॉन्टेक्ट बनाना चाह रहे थे. कुछ इसमें काफी हद तक सफल भी हुए. तीसरे स्थानीय विद्यार्थी वे थे जो व्यक्तिगत रूप से न सिर्फ प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और योगी आदित्यनाथ से नफरत करते थे. बल्कि यह शैक्षिक और मानसिक रूप से भी भाजपा के लिए चरमपंथ की भावना से भरे थे. इनके आंदोलन में कूदने के बाद स्थानीय निवासियों ने भी इनका हर तरह से सहयोग किया.

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की भूमिका :

इसकी भी दो वजहें थी. दिल्ली में जामिया नगर, बाटला हाउस और शाहीन बाग जैसा इलाका मिनी-पाकिस्तान के नाम से कुख्यात है. तो यहां भी इन छात्रों को वैचारिक रूप से सहयोग मिला. दूसरा यह भी कि इस इलाके में व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी द्वारा यह अफवाह फैलाई गई कि सभी मुसलमानों को बाहर करने के लिए ही सीएए लाया गया है और एनआरसी आने के बाद सबको इस देश से बाहर कर दिया जाएगा. हालंकि अभी एनआरसी का ड्राफ्ट तक नहीं बना है.

13 दिसंबर की रात तक सरकार विरोधी हरेक गुट जामिया के बाहर जमा होना शुरू करता है और यहां से पत्थरबाजी शुरू होती है. पुलिस को छात्र लगातार मॉक करते हैं. पुलिस संयम के साथ रक्षात्मक मुद्रा में स्टैंडबाई मोड़ पर खड़ी है. मीड़िया का सरकार विरोधी वर्ग भी इन छात्रों को प्रोत्साहन देता है.

14 दिसंबर की शाम तक आंदोलन बड़ा और अर्द्ध-हिंसक हो जाता है. सरकार की नीतियों के विरोध से हटकर यह आंदोलन डी-रेल हो चुका है. अफवाहें जोर पर हैं. मीड़िया रिपोर्ट कर रहा है. जामिया मेट्रो स्टेशन से थोडी दूरी पर पुलिस की गाड़ी के पास खड़ा होकर मैं देख रहा हूं कि 13 दिसंबर के मुकाबले आज यहां छात्रों से ज्यादा स्थानीय लोग भी हैं.

छात्र कहीं स्थानीय और बाहरी लोगों की भीड़ मे गुम हो चुके हैं. उग्रता और बाहरी लोगों की कट्टरता खुल के सामने आ रही है. मैं बस पहुंचा ही था कि अचानक वहां पत्रकारों के साथ धक्का-मुक्की शुरू हो जाती है. गोदी-मीड़िया गो-बैक के नारे लगने शुरू हो जाते हैं. मैं ड़ीएसएलआर ऊपर करता हूं तभी दो लोग मुझे और पत्रकारों के पूरे दल को धक्के मारते हुए भगाने लगते हैं. मैं सुरक्षित स्थान ढूंढू तभी दो लंबी कद-काठी के लोग मेरी तरफ बढ़ते हैं और मेरा कॉलर पकड़ कर बाहर की तरफ धक्का दे देते हैं. यह स्टूड़ेंट नहीं थे. पीछे की तरफ चल देता हूं. फिर से उसी जगह खड़ा हो जाता हूं जहां पहले खड़े था. दूर. मैं देखता हूं भीड़ में फंसे टीवी मीड़िया के लोगों को भीड़ घेर लेती है. वह वहां से बाहर निकलने के लिए कसमसाते हैं पर बाहर नहीं निकल पाते हैं.

पुलिस के ऊपर पत्थरों की संख्या बढ़ चुकी है. प्रदर्शनकारी पुलिस को सड़क पर से पत्थर मार रहे हैं और पुलिस उन्हें पीछे खदेड़ रही है. मैं मेट्रो की तरफ लौट पड़ता हूं. हौजखास पहुंचने पर पता चलता है कि एहतियात के तौर पर आईआईटी मेट्रो स्टेशन अस्थाई रूप से बंद कर दिया गया है.

15 दिसंबर की शाम दोपहर लगभग 3 बजे मेरे पास सूचना आती है कि अभी जामिया पहुंचिए. स्थिति बिगड़ चुकी है. मैं वहां पहुंचा जहां बस जलाई गई थी. पुलिस बस की आग को बुझा रही थी. हेड़क्वार्टर से सुचना मिलती है कि इलाके में विवेक के अनुसार निर्णय लीजिए. पुलिस भीड़ के दोनों तरफ घेराबंदी शुरू कर देती है. उनकी सभी टीमें पूरी तरह से तैयार हो चुकी थीं. पुलिस अब कार्यवाही करने के लिए तैयार थी.

पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी नाकाबंदी कर पहले चार्ज के लिए खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार कर रहे थे. उनके हाव-भाव से बिल्कुल नहीं लग रहा है कि आज वह किसी पर भी किसी तरह की कोई ढ़िलाई करेंगे. मुझसे एक अधिकारी ने हाथ मिलाते हुए पूछा कि आप किस तरफ रहेंगे. मैंने पूछा न्याय किस तरफ है. वो बोले पता नहीं पर सुरक्षा हमारी तरफ है. इसी दौरान एक पत्थर आकर मेरे पास गिरता है. मैं पीछे हटता हूं. पुलिस वॉयरलेस से दोनों तरफ से भीड़ को पुश करने का आदेश देती है. पुलिस के लगभग 25 सिपाही आंसू गैस के साथ भीड़ के तरफ फायर करना शुरु कर देते हैं. बिना समय गवाएं कोई 5-5 सिपाहियों के 10 ग्रुप आंसु गैस की टीम के साथ रास्ता बनाते हुए तीसरी टीम के लिए रास्ता खोलते हैं. तीसरी टीम का मुख्य उद्देश्य लाठी चार्ज करना था.

रास्ता बनते ही पुलिस के लगभग 50 सिपाहियों की टीम इंस्पेक्टर स्तर के सिपाहियों के साथ भीड़ पर टूट पड़ती है. मैं भीड़ इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि वहां छात्रों और स्थानीय व बाहरी लोगों की संख्या मिश्रित थी.

पुलिस के आंसू गैस फायर करने के पहले तक पुलिस को लगातार पत्थर मारे जा रहे थे. उन्हें मां-बहन की गालियां दी जा रहीं थीं. भीड़ में खड़ा हर व्यक्ति उग्र था. कोई भी शांति और संयम का परिचय नहीं दे रहा था. वो स्टूड़ेंट थे पर आज और अभी वह उपद्रवियों से अधिक कुछ नहीं थे. उनके साथ भीड़ में शामिल बाहरी तत्व उनको उकसा रहे थे. पढ़े-लिखे दिमाग कानूनी मर्यादाएं भूल चुके थे. वो और बात है लाठी-चार्ज के बाद जामिया का हर स्टूड़ेंट भारतीय संविधान, उसकी प्रस्तावना और नागरिकों के मूल अधिकारों की ही बातें कर रहे थे. जिन्हें कुछ देर पहले ही वह खुद भूल चुके थे। कार्यवाही के पहले तक यही छात्र उसी संविधान में वर्णित नागरिकों के मूल कर्तव्य जैसे सरकारी संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचाना है भूल चुके थे. मार के आगे भूत भी भागता है यह तो लड़कों की भीड़ थी. छात्रों पर लाठी चार्ज होना चाहिए था या नहीं इस पर बहस हो सकती है. लेकिन उस समय वह छात्र नहीं उपद्रवी थे। लाठी चार्ज उस समय की जरूरत थी. नहीं होने पर स्थिति बहुत बिगड़ सकती थी.

मैंने पहले भी कहा है, हिंसा की उच्चता शांति का प्रथम द्वार है. फिर वह मृत्यु या भय का शून्य ही क्यों न हो. यह शांति लाने का अस्थाई, तात्कालिक और आजमाया हुआ सफल उपाय है. मैंने आंसू गैस के धुएं के बीच देखा सरकार की कब्र खोदने वाले लड़के पहली ही लाठी पर घुटनों पर आ गए. सड़क पर लेट गए और रहम की भीख मांगने लगे. अंतिम सांस तक जंग करने का नारा देने वाले लड़के पहली लाठी पर ही भाग खड़े हुए. इससे लगता है कि क्या भारत सिर्फ एक बातूनी देश है! आंदोलन करते हुए भीड़ को दो ही कलाएं आती थी. पहली मुंह से आवाज निकालने की दूसरी मोबाईल से रिकार्ड़िंग करने की. लाठी चार्ज के दौरान शरीर पर पड़ती हुई लाठियों के बीच रिकार्ड़िंग तो हो नहीं सकती और आवाज भी निकलती नहीं है क्योंकि चोट पड़ने के बाद कराहने की आवाज खुद निकल आती है. दम नहीं लगानी पड़ती है.

छात्र मजबूत थे,जवान थे, उनमें उर्जा थी और वह लाठियों की अपेक्षा निहत्थे थे. धुएं से उनका दम घुट रहा था. वह भाग रहे थे. वह बचने के लिए यूनिवर्सिटी में घुस गए. जो भी छात्र पुलिस के हत्थे चढ़े वो पीटे गए. इतना कि वह गिर पड़ने के बावजूद भाग रहे थे. उनके सामने यूनिवर्सिटी में घुसने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था. 10 मिनट में पूरी सड़क खाली हो गई. नजर आ रहे थे तो बस छात्रों के द्वारा फेंके गए पत्थर, आंसू गैस के खाली पड़े शेल और भागते समय बच्चों के पैरों से निकले जूते और चप्पल. यह सड़क शांत हुई ही थी कि यूनिवर्सिटी के अंदर से पत्थर आने लगे.

यह मानव स्वभाव है. आप आखिरी दम तक लड़ते हैं. छात्र खुले में पुलिस से ड़र कर भागे थे. हल्का सुरक्षित होने पर उन्होंने फिर से जवाब देना शुरू कर दिया. वह लाठी पड़ने का बदला निकालना चाह रहे थे. अब वह झुंझलाए थे. युनिवर्सिटी के दोनों तरफ से पुलिस पर पत्थर फेंके जा रहे थे. छात्रों का भरोसा था कि यूनिवर्सिटी के अंदर वह कुछ भी कर सकते हैं. यह उनके लिए नुकसानदायक साबित हुआ. विश्वविद्यालय शिक्षा का घर होता है. इसलिए संवैधानिक मर्यादा यह है कि पुलिस शिक्षा के घर में बिना इजाजत नहीं घुसती है.

‘आपत्तिकाले मर्यादा नास्ति’ पुलिस को स्थिति नियंत्रण में लेनी थी. आज वह उसी मंशा से मौजूद थी. कितनी देर लगती है पुलिस को अंदर घुसने में. पुलिस यूनिवर्सिटी के अंदर घुस चुकी थी. जोशीले छात्र इस स्थिति के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे. यह उन्होंने नहीं सोचा था. पुलिस को यूनिवर्सिटी के अंदर घुसते देख पुलिस को मां की गाली दे रहे एक छात्र का चेहरा मैंने देखा था. वह भाग नहीं पाया क्योंकि वह भागने के लिए तैयार ही नहीं था. उसे जरा भी अंदाजा नहीं था कि पुलिस अंदर आ जाएगी. वह लड़का पीटा गया. उसके पीटे जाने के दौरान मैंने देखा न जाने कितने पुलिस वाले उसे बिना रहम के पीटते हुए वही गाली उस लड़के को दे रहे थे. मैं उसकी मां के लिए दुखी हुआ. अगर घर पहुंचने पर उसकी मां ने उस लड़के को देखा होगा तो वह भी दुखी हुई होंगी.

पुलिस विध्वंसक की तरह आगे बढ़ रही थी. छात्र ड़र, नफरत और प्रतिक्रिया न दे पाने की झल्लाहट में बिल्ड़िगों में छुपते हुए गालियां दे रहे थे. पुलिस भी पीछे-पीछे बिल्ड़िंग में घुस गई. अब छात्रों के पास पिटने और पिटते हुए भागने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. कुछ पुलिस वाले जिग-जैग की तरह हर बिल्ड़िंग के गेट के बाहर खडे़ हो गए और लड़कों के निकलने का इंतजार करने लगे. कुछ छात्रों ने पुलिस से इंगेज भी करना चाहा पर वह भी न्यु़ट्रलाइज्ड़ कर दिए गए.

‘लाइब्रेरी’ कथा की सच्चाई :

पुलिस लाईब्रेरी के अंदर जाकर मार रही थी. छात्रों का तर्क की लाईब्रेरी में छात्र पढ़ रहे थे. बेसुरा तथ्य है. उस दिन उस समय कौन पढ़ रहा था. फिर भी इतनी भरी लाईब्रेरी तो मैंने कभी नहीं देखी. निकलते हुए छात्रों की पिटाई हो रही थी. कोई बच नहीं पा रहा था. पुलिस मारते वक्त किसी के साथ भेदभाव नहीं करती. जो समाने आता है उसको पीटती है. सड़क शांत थी. हॉस्टल के अंदर से लड़कियों के चीखने की आवाज आ रही थी. लाइब्रेरी से लड़कियां बचाओ-बचाओ की आवाजें आ रही थी. हिंसा से सभी डरते हैं. हम कुछ पुलिस वालों के साथ अनहोनी की आशंका में आ रही आवाजों की तरफ भागते हैं. तभी मैं एक पत्थर से टकराकर गिर ही जाता हूं. साथ चल रहे पुलिसकर्मी अपने दो साथियों से मुझे पुलिस की वैन की तरफ ले जाने को कहते हैं.

बाहर आकर देखता हूं कि कई पत्रकारों को भी पुलिस ने पीटा है. उनसे बदसलूकी की है. बीबीसी की एक पत्रकार का मोबाईल छीनकर कथित तौर पर उनकी पिटाई की गई. सोचने लगता हूं कि लाइन के इस तरफ रहूं या उस तरफ इस हिंसा में हम पत्रकारों का मारा जाना सत्य है. हम वो लोग हैं जो लाईन ऑफ ड्युटी पर दोनों तरफ से मारे जाते हैं.

मैं घायल पुलिसकर्मियों के साथ अस्पताल चला जाता हूं. लगभग दो दिन बाद मैं टीवी पर देखता हूं कि छात्र पुलिस वालों को गुलाब दे रहे हैं.

दिल्ली से एयू समाचार के लिए जर्नलिस्ट वैभव सिंह की स्पेशल कवरेज- यदि आपको यह अंदाज पसंद आया हो तो हमें कमेंट्स एवं मेल के माध्यम से जरूर बताएं। उसके बाद शाहीन बाग की कहानी का भी सच आपके सामने रखने का प्रयास करेंगे।
मेल आईडी : ausamachar@gmail.com

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